12th Hindi 100 Marks

BSEB 12th Board Exam Hindi Language Paper Most Important Short Long Type Question for Science Arts & Commerce Stream


1. अधिनायक कविता का भावार्थ लिखें। 

उत्तर– ‘अधिनायक’ शीर्षक कविता रघुवीर सहाय द्वारा लिखित एक व्यंग्य कविता है। इसमें आजादी के बाद के सत्ताधारी वर्ग के प्रति रोषपूर्ण कटाक्ष है । राष्ट्रीय गीत में निहित ‘अधिनायक’ शब्द को लेकर यह व्यंग्यात्मक कटाक्ष है। आजादी मिलने के इतने वर्षों के बाद भी आदमी की हालत में कोई बदलाव नहीं आया । कविता में ‘हरचरना’ इसी आम आदमी को प्रतिनिधि है। 

हरचरना स्कूल जाने वाला एक बदहाल गरीब लड़का है । कवि प्रश्न करता है कि राष्टगीत में वह कौन भारत भाग्य विधाता है जिसका गुणगान पुराने ढंग की ढीली-ढाली हाफ पैंट पहने हए गरीब हरचरना गाता है । कवि का कहना है कि राष्ट्रीय त्योहार के दिन झंडा फहराए जाने के जलसे में वह ‘फटा-सुथन्ना’ पहने वही राष्ट्रगान दुहराता है जिसमें इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी न जाने किस ‘अधिनायक’ का गुणगान किया गया है। 

कवि प्रश्न करता है कि वह कौन है जो मखमल, टमटम, वल्लभ तुरही के साथ माथे पर पगड़ी एवं चँवर के साथ तोपों की सलामी लेकर ढोल बजाकर अपना जय-जयकार करवाता है । अर्थात सत्ताधारी वर्ग बदले हुए जनतांत्रिक संविधान से चलती इस व्यवस्था में भी राजसी ठाठ-बाट वाले भड़कीले रोब-दाब के साथ इस जलसे में शिरकत कर अपना गुणगान अधिनायक के रूप में करवाये जा रहा है ।


2. जयशंकर प्रसाद का काव्यात्मक परिचय दीजिए। 

उत्तर– जयशंकर प्रसाद- जयशंकर प्रसाद छायावाद के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं । इनका जन्म 1889 ई. में वाराणसी में ‘सुँघनी साहू’ परिवार में हुआ । इनके पिता देवी प्रसाद साहू के यहाँ साहित्यकारों को बड़ा सम्मान मिलता था । जयशंकर प्रसाद ने आठवीं कक्षा तक की शिक्षा क्वींस कॉलेज से प्राप्त की, परन्तु परिस्थितियों से मजबूर होकर उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा तथा घर पर ही संस्कृत, फारसी, उर्दू और हिन्दी का अध्ययन किया । किशोरावस्था में ही माता-पिता तथा बड़े भाई का देहान्त हो जाने के कारण परिवार और व्यापार का उत्तरदायित्व इन्हें सम्हालना पड़ा, जिसे इन्होंने हँसते-मुस्कुराते हुए संभाला । उनका जीवन संघर्षों और कष्टों में बीता । पर साहित्य-सृजन और साहित्य-अध्ययन के प्रति वे सदैव जागरूक रहे । सन् 1937 में इनका देहावसान हुआ । जयशंकर प्रसाद हिन्दी के बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न साहित्यकार हैं । वे कवि, नाटककार, कहानीकार तथा उपन्यासकार के रूप में अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं । उन्हें हिन्दी का रवीन्द्र कहा जाता है । चित्रधारा, काननकुसुम, प्रेमपथिक, महाराणा की महत्त्व, झरना, लहर, आँसू तथा कामायनी उनकी प्रमुख काव्य-रचनाएँ हैं । ‘कामायनी’ जयशंकर प्रसाद का महाकाव्य है । यह छायावाद की ही नहीं, आधुनिक हिन्दी काव्य की अमूल्य निधि है । । 

जयशंकर प्रसाद के नाटक हैं-विशाख, अजातशत्रु, स्कन्दगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, चन्द्रगुप्त आदि । कंकाल, तिली. इरावती (अधूरा) इनके उपन्यास हैं । छाया, आँधी, प्रतिध्वनि, इन्द्रजाल तथा आकाशदीप इनके पाँच कहानी-संग्रह हैं। 

जयशंकर प्रसाद के काव्य की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं । वे छायावादी कवि हैं तथा उनके काव्य में प्रेम और सौन्दर्य का चित्रण है। प्रकृति-सौन्दर्य के भी वे अदभुत चितेरे हैं। नारी की गरिमा उनके काव्यों और नाटकों में अंकित है । रहस्य भावना भी कहीं-कहीं झलकती है । उनका महाकाव्य ‘कामायनी’ मानवता के विकास की कथा प्रस्तुत करता है । प्रसाद के काव्य के वस्त-पक्ष (भाव-पक्ष) की भाँति उनके काव्य का कला-पक्ष भी सशक्त है । खडीबोली को साहित्यिक सौष्ठव प्रदान करने में उनका योगदान प्रशंसनीय है । रस, छन्द, अलंकार आदि का रमणीयता में उनका काव्य है । समग्रतः प्रसाद आधुनिक काव्य का सर्वश्रेष्ठ कवि हैं।


प्रश्न 3. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के काव्य-आदर्श क्या थे, ‘प्रगीत और समाज’ पाठ के आधार पर स्पष्ट करें। 

उत्तर- डॉ. नामवर सिंह के ‘प्रगीत और समाज’ शीर्षक निबंध के अनुसार आचार्य रामचन्द्र । शुक्ल के काव्य का आदर्श प्रबंधकाव्य थे, क्योंकि प्रबन्धकाव्य में मानव जीवन का एक पूर्ण दृश्य होता है । प्रबन्धकाव्य जीवन के सम्पूर्ण पक्ष को प्रकाशित करता है। आचार्य शुक्ल को भी उन्हें इसलिए परिसीमित लगा क्योंकि वह गीतिकाव्य है। आधुनिक कविता से उन्हें शिकायत भी थी, इसका कारण था-“कला कला” की पुकार, जिसके फलस्वरूप यूरोप में प्रगीत-मुक्तकों (लिरिक्स) का ही चलन अधिक देखकर यह कहा जाने लगा कि अब यहाँ भी उसी का जमाना आ गया है । इस तर्क के पक्ष में यह कहा जाने लगा कि अब ऐसी लंबी कविताएँ पढ़ने की किसी को फुरसत कहाँ है जिनमें कुछ इतिवृत्त भी मिला रहता हो। ऐसी धारणा बन गई, कि अब तो विशुद्ध काव्य की सामग्री जुटाकर सामने रख देनी चाहिए जो छोटे-छोटे प्रगीत-मुक्तकों में ही संभव है। इस प्रकार काव्य में जीवन को अनेक परिस्थितियों की ओर ले जाने वाले प्रसंगों या आख्यानों की उद्भावना बन्द सी हो गई। यही कारण था कि ज्यों ही प्रसाद की “कामायनी”, “शेरसिंह का शस्त्र समर्पण”, “पेसोला की प्रतिध्वनि.”, “प्रलय की छाया” तथा निराला की “राम की शक्तिपूजा” तथा “तुलसीदास” जैसे आख्यानक काव्य सामने आए तो आचार्य शुक्ल ने संतोष व्यक्त किया।


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